सामयीन हजरात अस्सलामुअलैकुम व रहमतुल्लाह व बराकातहू। सामयीन हजरात हम में से हर कोई जानना चाहता है कि हजरत सैयदना इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम ने यजीद की बैअत क्यों नहीं की? अगर वह यजीद की बैयत कर लेते तो क्या करबला की जंग नहीं होती। आज हम इंसाअल्लाह इतिहास की रौशनी में इस पर गुफ्तगू करेंगे। आपको बता दें कि हजरत उस्माने गनी रदीअल्लाहु तआला अनहू के दौरे खिलाफत में कुछ यहूदी मुसलमान बनने का ढोंग करके मुसलमानों के अन्दर मिल गये थे इनको मुनाफिक कहा जाता था जिनमें अब्दुल्लाह इब्ने सबा सबका अगुआ माना जाता है। यह सभी मुनाफिक खुफिया तरीके से मुस्लिम रियासतों अरब व अजम व मिस्र में जा जा करके मुसलमानों का अकीदा खराब करने और मुस्लिम अवाम और मुस्लिम राजनेताओं को एक दूसरे के खिलाफ उकसाने का बहुत बड़ा खुफिया कम्पेन चलाते थे। इन्हीं के षडयंत्रो और उकसावे की वजह से मुसलमानों में अनेकों आंतरिक आपसी लड़ाईयां हुई। ऐसे मुनाफिक पक्ष और विपक्ष दोनों में रहते थे और दोनों साइड को उकसाते रहते थे ताकि मुसलमानों में आपसी लड़ाई कभी भी शांत न हो। हजरत उस्मान गनी रदीअल्लाहु तआला अनहू को शहीद करवाने में अब्दुल्लाह इब्न सबा का हाथ बताया जाता है और ऐसा माना जाता है कि हजरत अली रदीअल्लाहु तआला अनहू को भी अब्दुल्ला इब्ने सबा से प्रभावित लोगों द्वारा कूफा में नमाज के लिए जाते वक्त शहीद किया गया था। जब हजरत इमामे हसन अलैहिस्सलाम और हजरत अमीर मुआविया रदीअल्लाहु तआला अनहू के दरमियान कूफा में सुलह समझौता हुआ तो कूफा में ही हजरत इमामे हसन अलैहिस्सलाम के रान मे कूफियो द्वारा नेजा मारा गया था। ऐसा सम्भव है कि जब हजरत इमामे हसन अलैहिस्सलाम ने अपनी खिलाफत हजरत अमीर मुआविया रदीअल्लाहु तआला अनहू को सौंप दी हो तो कूफा के लोग नाराज़ हो गये हों और उन्होंने ने ही नाराजगी और नफरत के चलते हजरत इमामे हसन अलैहिस्सलाम को उनकी बीबी से जहर दिलवाया हो। हजरत इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत में भी यहूदी से मुसलमान बनें इन मुनाफिकों की बहुत बड़ी भूमिका थी। इस्लामिक खिलाफत यानी अरब अजम व मिस्र सभी जगह यहूदी से मुसलमान बने मुनाफिकों ने खूब फित्ना और फसाद फैला रखा था। कूफा में भी अब्दुल्लाह इब्न सबा से काफी लोग प्रभावित थे उसने कूफा वालों को खूब गुमराह कर रखा था। मुसलमानों में अंदरूनी गुटबाजी चरम सीमा पर पहुंच चुकी थी। मजहबे इस्लाम में किसी भी खलीफा के वफात के बाद में उसका वारिस खलीफा नहीं हो सकता था जब तक की खलीफा को चुनने वाली मजलिसे अल सूरा उसको न चुन लेती। मजलिसे अल सूरा मुस्लिम विद्वानों का एक समूह होता था जो सर्वसम्मति से किसी व्यक्ति को खलीफा चुनता था। हजरत अमीर मुआविया रदीअल्लाहु तआला अनहू ने बिना मजलिसे अलसूरा की मंजूरी के ही यजीद को अपना वारिस खलीफा घोषित कर दिया था। सामयीन हजरात यजीद इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ काम करता था इसीलिए हजरत इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम और हजरत अब्दुल्लाह इब्न उमर रदीअल्लाहु तआला अनहू और हजरत अब्दुल्लाह इब्न जुबेर रदीअल्लाहु तआला अनहू ने यजीद के खलीफा बनने पर उसकी बैअत नहीं की। जब उन्होंने बैअत से इन्कार किया तो यजीद ने उनसे जबरन बैअत लेने की ठानी। यजीद की बैअत से बचने के लिए हजरत इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम को मदीना से मक्का जाना पड़ा। चूंकि कूफा के लोग शुरू से ही षड्यंत्र करते रहे थे इसी के चलते उन्होंने कई खत हजरत इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम को कूफा आने और उनके हाथ पर बैअत करने के सिलसिले में लिखे थे। हजरत इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम का जब मक्का जाने के बाद भी मक्का के लोगों ने दिल से साथ नहीं दिया तो हजरत इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम को हज का इरादा तर्क करके कूफा जाना पड़ा। कूफा जाने से पहले हजरत सैयदना इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम ने हजरत सैय्यदना मुस्लिम बिन अकील रदीअल्लाहु तआला अनहू को कूफा के हालात का जायजा लेने के लिए कूफा भेजा था। कूफा वालों ने हजरत मुस्लिम बिन अकील रदीअल्लाहु तआला अनहू से खुलूस व मोहब्बत दिखाकर हजरत सैयदना इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम के नाम कूफा वालों की मोहब्बत और दीनदारी की प्रशंसा और कूफा आने का खत तहरीर कराकर भेजवाया। इसी बीच यजीद ने उबैदुल्ला इब्न जियाद को कूफा का हाकिम बनाकर भेजा जो 18 लोगों के हमराह कूफा पहुंचा था। उबैदुल्ला इब्न जियाद ने हजरत इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम के कासिद को कूफा मे शहीद करा दिया। उबैदुल्ला इब्ने जियाद ने कूफा से ही हजरत इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम के खिलाफ लड़ने और जबरन बैयत लेने के लिए एक बड़ी फौज बनाकर भेजा था। जब हजरत मुस्लिम बिन अकील रदीअल्लाहु तआला अनहू का खत पाकर हजरत इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम कूफा रवाना हुए तो रास्ते में ही उन्हें हजरत मुस्लिम बिन अकील रदीअल्लाहु तआला अनहू की शहादत और कूफा वालों के धोखे की खबर मिली। आपसी मशविरे के बाद वापसी का फैसला तर्क करके वह आगे सफर जारी रखते हुए कर्बला की सरजमीन पर खेमाजन हुए। सामयीन हजरात यजीद इस्लामी सिद्धांतों के विरुद्ध काम करने वाला क्रूर भ्रष्ट और निरंकुश व्यक्ति था। ऐसे में हज़रत इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम जो कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के नवासे थे और मौजूदा इमाम थे अगर वह यजीद की बैअत कर लेते तो इस्लामी सिद्धांतों के विरुद्ध काम करने वाले भ्रष्ट क्रूर व निरंकुश यजीद के कामों को इस्लामिक मान्यता मिल जाती और इससे मजहबे इस्लाम की आत्मा न केवल छलनी हो जाती बल्कि दीने हक को गंभीर चोट पहुंचती। साथ साथ दीन ए हक की पकड़ कमजोर हो जाती। इसीलिए हजरत सैयदना इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम ने यजीद की बैय्यत नहीं की और दीने हक की खातिर अपना सब कुछ कुर्बान कर अपने नाना के दीने हक के परचम को बुलंद किया और दीन की खेती को अपने और अपने अहलो अयाल के खून से सींचकर दीन ए हक को अमर कर दिया। आओ हम सभी ऐसे बहादुर दीने हक के शेर हजरत इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम व उनके अहलो अयाल पर दरूदो सलाम भेजें और उनकी शहादत की बरसी यानी दसवी मुहर्रम को दीने हक पर चलने का अहद करें। आज एक सवाल जो मेरे मन में बार बार उठ रहा है वह यह है कि एक तरफ नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के नवासे तलवारों के साये में नमाज अदा कर रहे थे और दीन की खातिर अपना सबकुछ कुर्बान कर रहे थे वहीं दूसरी ओर अरब व अजम को फतह करने वाली कौमे मुस्लिम इतनी कमजोर कैसे हो गई थी कि सरकारे मदीना सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के नवासों को जब कर्बला में शहीद किया जा रहा था तो उनके साथ नहीं खड़ी थी। वह मुसलमान कैसे थे जो उनके नाना ही के दीन पर थे और उन्होंने नबी करीम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम के नवासों पर कैसे इतनी क्रूरता की? सामयीन हजरात अब्दुल्लाह इब्ने सबा जैसे लोग आज भी मुस्लिम कम्यूनिटी के अन्दर मौजूद हैं जो आज भी पूरी ताकत से मुसलमानों को और छोटे-छोटे टुकड़ों में बांट रहे हैं। इतिहास से सबक लेने के बजाये सभी मुस्लिम रहनुमा फिरका परस्ती को लगातार हवा दे रहे हैं जो कि बहुत शर्मनाक है। आओ मिलकर फिरका परस्ती के इस फैलते जहरीले वाईरस को रोकें। अल्लाह हम सबको हिदायत दे। आमीन। एक बार फिर हजरत इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम व उनके अहलो अयाल पर दरूदो सलाम भेजें। वीडियो मे अगर कोई कमी रह गयी हो तो माजरत चाहेगें। अगर यह वीडियो आपको अच्छी लगे तो दीन की यह जानकारी अपने साथियों को भी शेयर करना न भूलें। आमीन।